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Sunday, 6 May 2007

वेदना की ये निशानी ढुलकने दो !

मैं वियोगी प्यार के आंसू न पोंछो
वेदना की ये निशानी ढुलकने दो
ज़िन्दगी बेरास्ता हो जायेगी
तुम हमारी ब्यथा की आंधी न रोको ।

एक निश्चित क्रम सुबह और शाम का
लिए ज्यों ज्यों ज़िन्दगी ढलती रही
सजल मेघों की तरह भीगी हुयी
एक स्मृति है कि जो पलती रही ।

ये घुमड़ते मेघ जायेंगे कहॉ
बरसने दो बूँद बनकर वेदना
मुझे इन से प्रीत है अनुराग है
ये हमारी साधना हैं अर्चना ।

बाँध टूटा है द्रगों के धैर्य का
ये किसी की देन हैं इन को न टोको
जलधि से भी अधिक गहरायी लिए

पिघलते विश्वास की पीड़ा न रोको ।

Friday, 6 April 2007

क्यों कि मेरा नीड़ मुझ से दूर था !


जब कि शाम आयी पखेरू फिर चले
कारवाँ निज पन्थ पर आगे बढ़ा
मैं अकेला दर्द का मारा हुआ
उस घड़ी में भी अथक चलता रहा
क्योंकि मेरा नीड़ मुझ से दूर था ।


रात भर चलता रहा येह सोचकर
कभी तो गंतब्य की डेवोढ़ी दिखेगी
नियति के परिधान की गठरी समेटे
कभी तो मंतव्य को कुछ गति मिलेगी ।

सोच लो जितना तुम्हें स्वीकार है
फूल मन के हैं कि जो खिलते नहीं हैं
एक मन है एक मन की चाह है
येह सुबह और शाम हैं मिलते नहीं हैं ।

जब कि प्रात आया विहंग वर उड्चले
कारवाँ निज पन्थ पर आगे बढ़ा
मैं उदास, हताश , हटकर राह से
रूपसी को छितिज की तकता रहा
क्योंकि मेरा नीड़ अब भी दूर था ।

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